दुनिया में अनेक प्रकार के लोग होते हैं; कुछ लोग निःस्वार्थ अच्छाई के कारण दूसरों की मदद करने में खुशी महसूस करते हैं, जबकि कुछ लोग इसी भलेपन का गलत फायदा उठाने के इंतज़ार में रहते हैं। किसी अच्छे और सरल व्यक्ति की मासूमियत का लाभ उठाना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि रिश्तों में बने विश्वास को भी चोट पहुँचाने वाला होता है। यह कहानी ऐसी ही निःस्वार्थ भावना और विश्वास पर आधारित है, जो हमें भलाई का असली मूल्य और छल-कपट के दुष्परिणाम समझाती है।
सुंदरबन नाम के एक मनमोहक जंगल में घडने वाली यह कथा झुमझुम नाम की एक भोली गिलहरी और भोंडू नाम के एक चालाक कौए के इर्द-गिर्द घूमती है। झुमझुम का स्वभाव हमेशा दूसरों की मदद करने वाला था, जबकि भोंडू को बिना मेहनत किए सबकुछ पा जाने की आदत पड़ गई थी। झुमझुम की इसी “निःस्वार्थ दयालुता” का फायदा उठाने के लिए भोंडू ने एक चालाक योजना बनाई। उसने झुमझुम के दयालु मन का इस्तेमाल करके अपना पेट भरने की सोची, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि प्रकृति का न्याय कभी न कभी अवश्य होता है।
यह कथा केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि बच्चों के मन में “विश्वास” और “कर्म” जैसे महत्त्वपूर्ण संस्कार भी जगाती है। जब हम किसी के भलेपन का गलत फायदा उठाते हैं, तब हम सिर्फ उस व्यक्ति को ही नहीं ठगते, बल्कि भविष्य में मिलने वाली मदद और भरोसे के रास्ते भी बंद कर देते हैं।
“झुमझुम और भोंडू का मीठा सबक” बच्चों को यही सिखाती है कि कठिन समय में किया गया सहयोग और अर्जित किया हुआ विश्वास कितना अनमोल होता है।
🌳 सुंदरबन की प्यारी सुबह:
पहाड़ों के पीछे और नदी के उस पार एक चमकता हुआ जंगल था—सुंदरबन।
सुबह की धूप पत्तों पर ऐसे चमक रही थी जैसे पेड़ों ने सोने की चूड़ियाँ पहन ली हों।
इस जंगल में हर दिन नई खुशबू, नए रंग और नई कहानियाँ जन्म लेती थीं।
इसी सुंदरबन में एक प्यारी-सी छोटी गिलहरी रहती थी—झुमझुम।
झुमझुम छोटी, फुर्तीली थी, और उसका दिल दया से भरा हुआ था।
वह जंगल में सबकी दोस्त थी—
किसी को गिरा हुआ देखती तो मदद करती,
किसी को उदास देखती तो समझाती,
और कोई हार मान ले तो उसे फिर खड़ा करने के लिए आगे बढ़ जाती।
झुमझुम हमेशा प्रेम और मदद के लिए तैयार रहती!
कालू—चालाक, पर थोड़ा-सा आलसी
यही नहीं, सुंदरबन में एक चमकदार काला कौआ भी रहता था—भोंडू।
वह तेज दिमाग वाला था,
लेकिन… थोड़ा आलसी और चालाक भी।
भोंडू अक्सर सोचता—
“झुमझुम दूसरों की इतनी मदद कैसे कर लेती है?”
फिर उसके मन में एक तेज चमकती—पर शरारती—कल्पना आई:
“वाह! यह तो बहुत भोली है। मैं थोड़ा नाटक करूँगा और आसानी से खाना पाता रहूँगा… मेहनत क्यों करूँ?”
🎭 धूर्त शुरुआत:
एक दिन भोंडू लंगड़ाते हुए झुमझुम के पास आया।
उसकी आवाज बिल्कुल दयनीय थी:
“झुमझुम बहन… मेरे पंख में बहुत दर्द है। उड़ भी नहीं पा रहा हूँ।
क्या मुझे थोड़ा कुछ खाने को मिल सकता है?”
झुमझुम का नर्म दिल पिघल गया।
“अरे! तुम्हें बहुत चोट लगी है क्या? तुम आराम करो,
मैं अभी तुम्हारे लिए अखरोट लेकर आती हूँ!”
भोंडू ने आँखें आधी बंद कर लीं—और अंदर ही अंदर मुस्कुराया।
उस दिन के बाद भोंडू रोज़ कोई न कोई नया बहाना बनाता—
कभी पेट दर्द,
कभी चक्कर,
कभी घास में पैर कट गया,
कभी पंख थक गया!
और भोली झुमझुम रोज़ उसे कुछ न कुछ दे देती।
🌰 झुमझुम कमजोर होती गई, और भोंडू मोटा!
धीरे-धीरे चिक्की के संग्रहीत अखरोट खत्म होने लगे।
वह थोड़ी कमजोर और थकी-थकी दिखने लगी।
और भोंडू?
अरे! वह तो गोल-मटोल हो गया—जैसे मिठाइयों की दुकान ही चलाता हो!
जंगल के सभी जानवर चुपचाप यह सब देख रहे थे।
उन्हें पता था कि भोंडू नाटक कर रहा है।
धीरे-धीरे उसका झूठ सबको समझ में आने लगा।
🌪 एक भयानक तूफ़ान
एक रात अचानक आसमान काला हो गया।
तेज़ आँधी, बिजली, गर्जना—पूरे जंगल को हिला गई!
जो पेड़ भोंडू का घर था, वह हिलने लगा—
और धड़ाम! गिर पड़ा।
अब उसका घोंसला खाली था,
और इस बार सच में उसका पेट दर्द कर रहा था।
भोंडू दर्द से चिल्लाया:
“मदद करो! कोई है? कृपया मेरी मदद करो…!”
लेकिन पूरा जंगल चुप था।
हर जानवर सोच रहा था—
“शायद यह फिर नाटक होगा।”
भोंडू का मन टूट गया।
वह ठंड में काँपने लगा…
और उसे अपनी सारी गलतियाँ याद आने लगीं।
🌼 झुमझुम की निःस्वार्थ अच्छाई
कुछ देर बाद छोटी-सी आवाज़ सुनाई दी—
टॅप-टॅप-टॅप…
वह झुमझुम थी!
भोंडू का दिल कांप गया—
“झुमझुम मेरी मदद क्यों करेगी?
मैंने तो इसे बहुत धोखा दिया है…”
लेकिन झुमझुम का दिल अब भी वही था—
गरम, प्यारा और निःस्वार्थ।
वह सूखे पत्ते लेकर आई,
अपने नन्हे हाथ फैलाए और बोली:
“तुम्हें सच में चोट लगी है, भोंडू।
घबराओ मत, मैं हूँ न।”
भोंडू की आँखों में आँसू आ गए।
❤️ कालू का एहसास
“झुमझुम… मैंने तुम्हारी निःस्वार्थ अच्छाई का बहुत फायदा उठाया।
क्या तुम मुझसे नाराज़ नहीं हो?”
झुमझुम मुस्कुराई और उसके पंखों पर हल्का हाथ फेरते हुए बोली:
“भोंडू भाई… मदद करना मेरा स्वभाव है।
लेकिन याद रखना—
विश्वास तोड़ना सबसे बड़ी गलती है।
आज मुश्किल समय में कोई भी तुम्हारे पुकार पर नहीं आया,
क्योंकि तुम्हारा भरोसा टूट चुका है।”**
भोंडू बिल्कुल चुप हो गया।
उसे गहरा पछतावा हुआ।
उसने समझ लिया—
निःस्वार्थ अच्छाई का गलत फायदा उठाने से केवल दुख मिलता है।
🌈 भोंडू का परिवर्तन
उस दिन के बाद भोंडू बदल गया।
वह भी झुमझुम की तरह दूसरों की मदद करने लगा—
कभी किसी बच्चे पक्षी को दाना ला देता,
कभी किसी प्यासे पक्षी को पानी दिखा देता,
कभी किसी गिरे हुए परिंदे को सहारा देता।
धीरे-धीरे पूरा जंगल उससे फिर प्यार करने लगा।
सुंदरबन में फिर से ख़ुशी की हवा बहने लगी।
🌟 कहानी का संदेश: निःस्वार्थ अच्छाई का मूल्य
✔ निःस्वार्थ दयालुता का सम्मान करें
जो लोग सबकी मदद करते हैं, उनका फायदा उठाना गलत है।
✔ विश्वास सबसे कीमती चीज है
एक बार टूट जाए तो कठिन समय में कोई भी साथ नहीं देता।
✔ चालाकी कभी फायदा नहीं देती
जैसा भोंडू ने भुगता—वैसा ही सीख सभी को लेनी चाहिए।
✔ दिल से मदद करें, बदले में कुछ न चाहें
मदद दुनिया को खूबसूरत बनाती है।
निष्कर्ष:
‘झुमझुम और भोंडू’ की इस प्यारी कहानी से हमने यह सीखा कि निःस्वार्थ अच्छाई कभी व्यर्थ नहीं जाती। भोंडू ने शुरुआत में झुमझुम की भलाई और विश्वास का दुरुपयोग किया, परन्तु कठिन समय में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
किसी को धोखा देकर जो सुख मिलता है वह क्षणिक होता है, जबकि संकट के समय की गई मदद और अर्जित विश्वास जीवनभर टिकते हैं — यही इस कहानी का मुख्य सार है। किसी अच्छे व्यक्ति की भोली सादगी को कभी उसकी कमजोरी न समझें; उसका सम्मान करें।
क्या आपने भी कभी किसी की इस तरह निस्वार्थ मदद की है और उससे आपको क्या अनुभव मिला? अपने विचार नीचे कमेंट में ज़रूर लिखें और बच्चों में अच्छे संस्कार फैलाने के लिए यह कहानी दूसरों के साथ भी साझा करें!