क्या आप ऐसे अद्वितीय, अगम्य स्वरुप से जुड़ना चाहते हैं जो आज भी सशरीर इस पृथ्वी पर विद्यमान हैं?
भागदौड़ और चुनौतियों से भरे इस जीवन में प्रायः हमारे मन में यह प्रश्न उठता है—क्या कोई ऐसी दिव्य शक्ति है जो हमारी पुकार तुरंत सुन सके? वेदों और पुराणों में अनेक देवताओं और उनके अवतारों का वर्णन मिलता है। किंतु क्या आप जानते हैं कि भगवान दत्तात्रेय आज भी अपने भक्तों की रक्षा हेतु इस युग में पृथ्वी पर विराजमान माने जाते हैं?
भगवान दत्तात्रेय को ‘स्मृतिगामी’ कहा जाता है—अर्थात् स्मरण करते ही वे भक्तों के समीप प्रकट हो जाते हैं। इसी परंपरा को उनके प्रथम अवतार प्रभू श्रीपाद श्रीवल्लभ ने और अधिक सशक्त किया। वे केवल ऐतिहासिक संत नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना हैं, जिनकी लीलाएँ और चमत्कार आज भी अनगिनत भक्तों के जीवन में परिवर्तन ला रहे हैं।
उनका पवित्र जन्मस्थान पिठापुरम एक सिद्धभूमि है। कहा जाता है कि वहाँ की धूल तक में दिव्यता समाई है। उनकी उपस्थिति आज भी इस भूमि को अद्वितीय आध्यात्मिक आभा प्रदान करती है।
इस लेख में आप केवल एक साधारण जीवन कथा नहीं पढ़ेंगे, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा पर निकलेंगे—प्रभु के विलक्षण जीवन को जानने की, पिठापुरम की रहस्यमयी महत्ता को समझने की, और उन महाशक्तिशाली स्तोत्रों का अनुभव करने की, जिनका पाठ करने मात्र से जीवन की दिशा परिवर्तित हो जाती है।
तो आइए, मन को एकाग्र करें और भगवान दत्तात्रेय के इस अद्भुत अवतार—श्रीपाद श्रीवल्लभ—की असीम कृपा में डूब जाएँ।
भगवान दत्तात्रेय- त्रिमूर्ति का साकार स्वरूप:

श्रीपाद श्रीवल्लभ की महिमा को समझने से पूर्व उनके मूल स्वरूप—भगवान दत्तात्रेय—का परिचय आवश्यक है। दत्तात्रेय कोई साधारण देव नहीं हैं; वे त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—की संयुक्त शक्ति का सजीव प्रतीक हैं।
यह कथा सतयुग की है। महर्षि अत्रि और उनकी पतिव्रता पत्नी देवी अनुसूया के कठोर तप और सतीत्व से त्रिदेवों की पत्नियाँ—सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती—चिंतित हो उठीं। उन्होंने अपने-अपने पतियों से देवी अनुसूया की परीक्षा लेने का निवेदन किया।
त्रिदेव साधु-वेश में आश्रम पहुँचे और भिक्षा में देवी अनुसूया से यह शर्त रखी कि वे उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराएँ। क्षणभर के लिए देवी चकित हुईं, परंतु अपने अडिग पतिव्रत धर्म की शक्ति से उन्होंने तीनों देवों को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और उन्हें स्नेहपूर्वक भोजन कराया।
कुछ समय पश्चात जब तीनों देवियाँ वहाँ पहुँचीं और यह दृश्य देखा, तो उन्होंने देवी अनुसूया से क्षमा याचना की। त्रिदेव भी उनकी निष्ठा से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे तीनों संयुक्त रूप से उनके पुत्र रूप में अवतरित होंगे। यही दिव्य संतान आगे चलकर भगवान दत्तात्रेय कहलाए।
उनका सबसे विलक्षण वरदान यही है कि वे अपने भक्तों के लिए सदैव सुलभ रहते हैं। आज भी वे सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर विचरण कर अपने उपासकों की पुकार का उत्तर देते हैं।
श्रीपाद प्रभु का दिव्य अवतरण:
भगवान दत्तात्रेय ने कलियुग में अपने भक्तों के उद्धार हेतु अवतार लेने का संकल्प किया था। यह दिव्य संकल्प उनके द्वितीय अवतार श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में पूर्ण हुआ। वे केवल एक महापुरुष या संत नहीं, बल्कि स्वयं दत्त प्रभु के बालरूप में अवतरित हुए, जिनकी अद्भुत एवं अलौकिक लीलाएँ आज भी श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति, श्रद्धा और उत्साह का संचार करती हैं।
1. श्रीपाद प्रभू का अलौकिक जन्म:
श्रीपाद श्रीवल्लभ का जन्म कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय महत्व की एक दिव्य लीला थी।
- जन्म तिथि: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी), वर्ष 1320। यह संयोग इस ओर संकेत करता है कि जैसे श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं, वैसे ही श्रीपाद जी भी भक्तों के सभी संकटों को दूर करने के लिए अवतरित हुए।
- जन्म स्थान: पीठिकापुरम (आज का पीठापुर), पूर्वी गोदावरी जिला, आंध्र प्रदेश। यह स्थान पहले से ही सिद्धभूमि माना जाता था।
- माता-पिता: माता सुमति देवी, जो अखंड सौभाग्यवती, पतिव्रता और धर्मपरायण थीं, और पिता ब्रह्मश्री घंडिकोटा अप्पलराज शर्मा, कृष्ण यजुर्वेद शाखा के प्रकांड विद्वान थे।
- गोत्र: भारद्वाज गोत्र।
कहा जाता है कि सुमती महाराणी ने उनके जन्म से पूर्व कई दिव्य स्वप्न देखे थे, जो एक महान आत्मा के आगमन का संकेत थे। जन्म के क्षण में सम्पूर्ण पीठापुरम एक अद्भुत प्रकाश और मधुर सुगंध से आच्छादित हो गया था, मानो स्वयं देवताओं ने इस अवतरण का उत्सव मनाया हो।
2. बालकृष्ण की स्मृति जगाती अद्भुत बाल लीलाएं:
श्रीपाद श्रीवल्लभ की बाल लीलाएं इतनी विलक्षण थीं कि लोग उनमें साक्षात् बालकृष्ण का स्वरूप अनुभव करते थे। वे आयु में छोटे अवश्य थे, परंतु उनका ज्ञान और शक्ति असीमित थी।
एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार, जब वे बहुत छोटे थे, तब बड़े-बड़े पंडित और विद्वान शास्त्रार्थ के लिए उनके घर आते थे। श्रीपाद जी वेदों और उपनिषदों के गूढ़तम रहस्यों को सरलता से प्रकट कर देते, जिससे विद्वान भी उनके चरणों में नतमस्तक हो जाते। वे अक्सर अपनी माँ से कहते— “माँ, मैं केवल तुम्हारा पुत्र नहीं, मैं सम्पूर्ण ब्रह्मांड का नाथ हूँ।”
श्रीपाद जी ने मात्र 30 वर्ष की आयु में अपनी अवतार लीला को पूर्ण किया। इसमें से 16 वर्ष उन्होंने पीठापुरम में और 14 वर्ष कृष्णा नदी के तट पर स्थित कुरवपुर में बिताए। इस संक्षिप्त अवधि में उन्होंने अनगिनत चमत्कार किए, अहंकारियों को विनम्र बनाया और अपने भक्तों को हर संकट से उबारा। उनका जीवन इस सत्य का साक्षात् प्रमाण है कि दिव्य शक्ति न समय की सीमाओं में बंधती है और न ही आयु की।
पीठीकापुरम जहाँ हर कण में बसी है पवित्रता:
श्रीपाद प्रभू ने अपने दिव्य अवतरण के लिए पिठापुरम को ही क्यों चुना? इसका कारण यह है कि पिठापुरम कोई साधारण नगर नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही एक सिद्ध शक्तिपीठ रहा है। यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी गहन और सशक्त है कि यह आज भी साधकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।
1. पादगया क्षेत्र की पौराणिक महिमा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार गयासुर एक महान असुर भक्त था। उसने इतनी कठोर तपस्या की कि देवता भी भयभीत हो उठे। तपस्या से प्रसन्न होकर उसे यह वरदान मिला कि उसका शरीर पृथ्वी का सबसे पवित्र स्थल बनेगा, और जो भी उसका दर्शन करेगा, उसे मोक्ष प्राप्त होगा।
इस वरदान के प्रभाव से यमलोक खाली होने लगा। तब देवताओं ने गयासुर से एक यज्ञ हेतु उसका शरीर माँगा। गयासुर ने सहर्ष अनुमति दी और लेटते ही उसका विराट शरीर कई मीलों तक फैल गया—
- सिर: गया (बिहार) में
- नाभि: जाजपुर (ओडिशा) में
- पैर: पिठापुरम (आंध्र प्रदेश) में
इसी कारण पिठापुरम को पादगया क्षेत्र कहा जाता है। यहाँ पितरों का श्राद्ध करना, गया में किए गए श्राद्ध के समान ही पुण्यदायी माना गया है।
2. कुक्कुटेश्वर स्वामी मंदिर की पौराणिक कथा:
गयासुर के शरीर पर देवताओं द्वारा किए जा रहे यज्ञ के समय उससे वचन लिया गया था कि वह सूर्योदय तक स्थिर रहेगा। किंतु देवता उसकी प्रबल भक्ति से भयभीत थे। इसी कारण आधी रात में भगवान शिव ने एक मुर्गे का रूप धारण किया और बांग दी। गयासुर को लगा कि प्रातः हो चुकी है, और वह उठ खड़ा हुआ। उसी क्षण भगवान शिव ने उसका उद्धार किया।
जहाँ शिव ने मुर्गा रूप में प्रकट होकर यह दिव्य लीला की, वहीं आज प्रसिद्ध कुक्कुटेश्वर स्वामी मंदिर स्थित है।
3. पुरुहुतिका शक्तिपीठ:
पिठापुरम की दिव्यता का प्रमाण इसके प्राचीन पुरुहुतिका शक्तिपीठ से भी मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवी सती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह किया, तो भगवान शिव शोक और क्रोध में उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे। सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के खंड कर दिए।
जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि पिठापुरम में देवी सती का कटि-प्रदेश (कमर का निचला भाग) गिरा था। इसी कारण यहाँ देवी पुरुहुतिका के रूप में विराजमान हैं। यह स्थान अठारह शक्तिपीठों में गिना जाता है और तांत्रिक तथा आध्यात्मिक साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
4. कुंती माधव मंदिर:
भारत में भगवान विष्णु के माधव स्वरूप के पाँच प्रमुख मंदिर हैं, 1) काशी में बिन्दु माधव, 2) प्रयाग में वेणी माधव, 3) रामेश्वर में सेतु माधव, 4) त्रिवेन्द्रम में सुंदर माधव, 5) पिठापूर में कुंती माधव, जिन्हें पंच माधव क्षेत्र कहा जाता है। पिठापुरम उन्हीं में से एक है। यहाँ पांडवों की माता कुंती ने भगवान माधव की आराधना की थी, जिसके कारण यह मंदिर कुंती माधव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इसी मंदिर की उपस्थिति से पिठापुरम को दक्षिण काशी की उपाधि प्राप्त हुई है। वास्तव में यह पावन स्थल अद्वितीय है, क्योंकि यहाँ दत्तात्रेय, शिव, शक्ति और विष्णु—सभी की दिव्य ऊर्जाएं एक साथ अनुभव की जाती हैं।
प्रभू कृपा प्राप्ति हेतु तीन शक्तिशाली स्तोत्र अर्थ सहित:
श्रीपाद श्रीवल्लभ ने अपने भक्तों को तीन अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र प्रदान किए हैं। ये स्तोत्र केवल शब्द नहीं, बल्कि स्वयं गुरु की चैतन्य शक्ति का जीवंत रूप हैं। इनका नियमित पाठ साधक के जीवन में असंभव को भी संभव बना देता है और हर संकट में कृपा का अनुभव कराता है।
1. श्रीपाद अष्टकम् :
अष्टकम्’ का अर्थ है — आठ पद्यों में रचित स्तोत्र। यह पावन रचना साधक के हृदय में श्रीपाद श्रीवल्लभ के चरणों के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति का भाव प्रज्वलित करती है।
जब जीवन में अकेलेपन, असहायता या दिशाहीनता का अनुभव हो, तब श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इस स्तोत्र का पाठ मन को स्थिरता, साहस और दिव्य मार्गदर्शन प्रदान करता है।
।। श्रीपाद अष्टकम् ।।
।।ॐ।।
।।श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये।।
अर्थ: मैं श्रीपाद राज की शरण में जाता हूँ I
वेदान्तवेद्योवरयोगिरूपं। जगत्प्रकाशं सुरलोकपूज्यं ।। इष्टार्थसिद्धिं करुणाकरेशं। श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ।।१।।
अर्थ: जो वेदान्त द्वारा जानने योग्य हैं, श्रेष्ठ योगी स्वरूप हैं, जगत को प्रकाशित करने वाले और देवलोक द्वारा पूजनीय हैं; जो अभीष्ट सिद्धियों को देने वाले करुणा के सागर हैं, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
योगिशरूपंपरमात्मवेषं। सदानुरागं सहकार्यरूपं ।। वरप्रसादं विबुधैकसेव्यं। श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ।।२।।
अर्थ: जो योगियों के ईश्वर हैं, साक्षात् परमात्मा के रूप में विद्यमान हैं, सदैव प्रेममय और लोक-कल्याणकारी हैं; जो श्रेष्ठ वरदान देने वाले और विद्वानों द्वारा सेवित हैं, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
काषायवस्त्रं करदंडधारिणं। कमण्डलुं पद्मकरेण शंखम ।।चक्रंगदाभूषितभूषणाढ्यम् । श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ।।३।।
अर्थ: जो गेरुए (काषाय) वस्त्र धारण करते हैं, जिनके हाथ में दंड, कमंडलु और कमल है; जो शंख, चक्र, गदा और विभिन्न आभूषणों से सुशोभित हैं, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
भूलोकसारं भुवनैकनाथं। नाथादीनाथं नरलोकनाथ।। कृष्णावतारं करूणाकटाक्षं। श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ।।४।।
अर्थ: जो इस पृथ्वी का सार हैं, समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं; जो नाथों के भी आदि नाथ और मनुष्यों के स्वामी हैं; जो कृष्ण के अवतार हैं और जिनकी दृष्टि करुणा से भरी है, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
लोकाभिरामं गुणभूषणाढ्यम्। तेजोमुनि श्रेष्ठमुनिर्वरेण्यं ।। समस्तदुःखानि भयानिशांतं। श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ।।५।।
अर्थ: जो समस्त संसार को आनंद देने वाले और दिव्य गुणों से अलंकृत हैं; जो तेजस्वियों में श्रेष्ठ मुनि और पूजनीय हैं; जो समस्त दुखों और भयों का अंत करने वाले हैं, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
कृष्णासुतीरे वसतिप्रसिद्धं। श्रीपादश्रीवल्लभ योगिमूर्तिम्। सर्वैजनैश्चितितकल्पवृक्षं। श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ।।६।।
अर्थ: जो कृष्णा नदी के तट पर निवास करने के लिए प्रसिद्ध हैं, जो साक्षात् योगमूर्ति श्रीपाद श्रीवल्लभ हैं; जो सभी भक्तों के लिए चिंतामण और कल्पवृक्ष के समान हैं, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
मन्त्राब्धिराजं युतिराजपुण्यं । त्रैलोक्यनाथं जनसेव्यनाथं ।। आनंदचित्तं अखिलात्मतेजं। श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये।।७।।
अर्थ: जो मंत्रों के समुद्र के स्वामी हैं, पुण्य के पुंज हैं; जो तीनों लोकों के नाथ और जन-जन द्वारा सेवित हैं; जो आनंदमय चित्त वाले और संपूर्ण आत्माओं के तेज स्वरूप हैं, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
मन्त्रानुगम्यं महानिर्वितेजं। महत्प्रकाशं महशांतमूर्तिम् ।। त्रैलोक्यचित्तं अखिलात्मतेजसं । श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये।।८।।
अर्थ: जो मंत्रों द्वारा प्राप्त करने योग्य हैं, अत्यंत तेजस्वी, प्रकाशवान और महान शांत मूर्ति हैं; जो तीनों लोकों के चित्त और अखिल आत्माओं के तेज हैं, उन श्रीपाद राज की मैं शरण लेता हूँ।
श्रीपादाष्टकमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । कोटिजन्म कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ।।
फलश्रुति: जो मनुष्य प्रातः काल उठकर इस पुण्यदायी ‘श्रीपादाष्टकम्’ का पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप केवल स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं।
2. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्तोत्रम् :
यह स्तोत्र श्रीपाद श्रीवल्लभ के करुणामयी एवं आकर्षक स्वरूप का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन प्रस्तुत करता है। इसके पाठ के समय यदि साधक मन में उनके दिव्य रूप का ध्यान करता है, तो यह साधना गुरु के साथ एक गहन एवं व्यक्तिगत आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का माध्यम बन जाती है।
।। श्रीपाद श्रीवल्लभ स्तोत्रम् ।।
श्रीपाद वल्लभ गुरोः वदनारविन्दं वैराग्य दीप्ति परमोज्वलमद्वितीयम् । मन्दस्मितं सुमधुरं करुणार्द्र नेत्रं संसार – ताप – हरणं सततं स्मरामि ।।
अर्थ: गुरु श्रीपाद श्रीवल्लभ के उस मुख-कमल का मैं निरंतर स्मरण करता हूँ, जो वैराग्य की दीप्ति (तेज) से परम उज्ज्वल और अद्वितीय है। जिनकी मंद मुस्कान अत्यंत मधुर है और जिनकी आंखें करुणा से भीगी हुई हैं, वे संसार के सभी दुखों और तापों को हरने वाले हैं।
श्रीपाद वल्लभ गुरोः करकल्पवृक्षं भक्तेष्ट – दान – निरतं रिपुसंक्षयं वै । संस्मरणमात्र चिति – जागरणं सुभद्रं संसार भीति – शमनं सततं भजामि ।।
अर्थ: गुरु श्रीपाद श्रीवल्लभ के हाथ भक्तों के लिए ‘कल्पवृक्ष’ के समान हैं, जो सदैव भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने में लगे रहते हैं और आंतरिक शत्रुओं (विकारों) का नाश करते हैं। जिनके केवल स्मरण मात्र से ही चेतना जागृत हो जाती है और जो अत्यंत कल्याणकारी हैं, संसार के सभी भयों को शांत करने वाले उन प्रभु को मैं भजता हूँ।
श्रीपाद वल्लभ गुरोः परमेश्वरस्य योगीश्वरस्य शिवशक्ती समन्वितस्य । श्री पर्वतस्य शिखरं खलु सन्निविष्टं त्रैलोक्य – पावन -पदाब्जमहं नमामि ।।
अर्थ: जो स्वयं परमेश्वर हैं, योगियों के ईश्वर हैं और साक्षात् शिव-शक्ति के सम्मिलित स्वरूप हैं; जो श्रीशैलम (श्री पर्वत) के शिखर पर विराजमान हैं, तीनों लोकों को पवित्र करने वाले उन श्रीपाद श्रीवल्लभ के चरण-कमलों में मैं प्रणाम करता हूँ।
3. सिद्धमंगलस्तोत्र:
सिद्ध मंगल स्तोत्र दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण, चमत्कारी एवं कल्याणकारी स्तोत्र है। इसकी प्रत्येक पंक्ति साधक को आंतरिक बल, विजय का आशीर्वाद और जीवन में मंगल की अनुभूति कराती है। जब भक्त इसे भावपूर्वक “जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखण्ड श्री विजयीभव” जैसे पवित्र जयघोष के साथ गाते हैं, तब यह स्तोत्र केवल शब्द न रहकर एक दिव्य अनुग्रह का प्रवाह बन जाता है। इसका संदेश है— आपकी सदैव विजय हो, समस्त दिशाओं पर आपका वर्चस्व स्थापित हो और आपकी अखंड श्री अनंतकाल तक विजयी बनी रहे।
।। सिद्धमंगलस्तोत्र ।।
श्री मदनंत श्रीविभूषित अप्पल लक्ष्मी नरसिंह राजा।जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव।।
अर्थ: अनंत श्री से विभूषित, श्री अप्पलराज शर्मा और माता सुमती के पुत्र, श्रीपाद श्रीवल्लभ! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
श्री विद्याधरी राधा सुरेखा श्री राखीधर श्रीपादा।जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव।।
अर्थ: विद्याधरी, राधा और सुरेखा जैसी दिव्य शक्तियों द्वारा पूजित और रक्षा-सूत्र (राखी) धारण करने वाले श्रीपाद! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
माता सुमती वात्सल्यामृत परिपोषित जय श्रीपादा।जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव।।
अर्थ: माता सुमती के वात्सल्य रूपी अमृत से पोषित होने वाले श्रीपाद! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
सत्यऋषीश्वरदुहितानंदन बापनाचार्यनुत श्रीचरणा।जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव।।
अर्थ: महान ऋषि बापन्नार्य (जो सत्य ऋषि के समान हैं) के दौहित्र (बेटी के बेटे) और उनके द्वारा पूजित चरणों वाले श्रीपाद! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
सावित्र काठकचयन पूण्यफला भारद्वाज ऋषी गोत्र संभवा।जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव।।
अर्थ: भारद्वाज गोत्र में उत्पन्न, ‘सावित्र काठक चयन’ नामक महान यज्ञ के पुण्य फल स्वरूप प्रकट हुए श्रीपाद! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
दौ चौपाती देव लक्ष्मीगण संख्या बोधित श्रीचरणा । जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव ।।
अर्थ: जिनके श्रीचरणों की महिमा २४९८ द्वारा प्रतिपादित (सूचित) की जाती है, उन श्रीचरणों वाले हे श्रीपाद! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
पुण्यरूपिणी राजमांबासुत गर्भपुण्यफलसंजाता । जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव ।।
अर्थ: पुण्यरूपा राजमांबा की पुत्री (सुमती) के गर्भ से प्रकट हुए पुण्य फल स्वरूप श्रीपाद! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
सुमतीनंदन नरहरीनंदन दत्तदेव प्रभू श्रीपादा । जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव ।।
अर्थ: माता सुमती और पिता नरहरि (अप्पलराजु शर्मा) के आनंद स्वरूप, साक्षात् दत्त प्रभु श्रीपाद! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
पीठिकापुर नित्यविहारा मधुमतीदत्ता मंगलरूपा । जय विजयीभव, दिग्विजयीभव, श्रीमदखंड श्री विजयीभव ।।
अर्थ: पीठापुर (आंध्र प्रदेश) क्षेत्र में नित्य विहार करने वाले, अनघालक्ष्मी के साथ दत्तात्रेय के मंगलकारी स्वरूप! आपकी जय हो, आप दिग्विजयी हों, आपकी अखंड विजय हो।
सिद्ध मंगल स्तोत्र का महत्व एवं लाभ:
- इस स्तोत्र का पाठ करना सहस्रों ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्यदायक माना जाता है।
- इसके नियमित जप से साधक को स्वप्नावस्था में सिद्ध पुरुषों एवं गुरुओं के दिव्य दर्शन प्राप्त होते हैं।
- यह स्तोत्र साधक की सभी सात्त्विक एवं पवित्र इच्छाओं की पूर्ति करने में समर्थ है।
- इसके निरंतर पाठ से भक्त पर श्रीपाद श्रीवल्लभ की असीम कृपा एवं संरक्षण प्राप्त होता है।
- सर्वाधिक विशेष यह है कि इसके गायन से सूक्ष्म लोक में विद्यमान सिद्धियाँ एवं दिव्य शक्तियाँ साधक के अनुकूल होकर उसका मार्ग प्रशस्त करती हैं।
पीठापुरम (पिठापुर) कैसे पहुँचें?
यदि आप श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के जन्मस्थान के दर्शन करना चाहते हैं, तो यहाँ पहुँचने के मार्ग निम्नलिखित हैं:
- रेल मार्ग (By Train): पीठापुरम (Pithapuram) का अपना रेलवे स्टेशन है, जो चेन्नई-हावड़ा मुख्य मार्ग पर स्थित है। इसके अलावा, काकीनाडा (Kakinada) और सामलकोट (Samalkot) बड़े रेलवे स्टेशन हैं, जो यहाँ से मात्र 12-15 किलोमीटर की दूरी पर हैं।
- वायु मार्ग (By Air): सबसे नजदीकी हवाई अड्डा राजमुंद्री (Rajahmundry) है, जो पीठापुरम से लगभग 70 किलोमीटर दूर है। यहाँ से आप टैक्सी या बस द्वारा आसानी से पहुँच सकते हैं।
- सड़क मार्ग (By Road): आंध्र प्रदेश के प्रमुख शहरों (जैसे विशाखापत्तनम या विजयवाड़ा) से पीठापुरम के लिए नियमित बस सेवा उपलब्ध है।
निष्कर्ष:
आपके और दिव्य कृपा के बीच बस एक पुकार की दूरी है
श्रीपाद श्रीवल्लभ केवल इतिहास के एक संत नहीं, बल्कि आज भी जीवंत, जाग्रत और करुणामयी गुरु हैं। उनका पवित्र जीवन, पावन जन्मभूमि पिठापुरम और उनके दिव्य स्तोत्र इस सत्य के साक्षी हैं कि ईश्वर की कृपा हमसे कभी दूर नहीं है।
इस लेख से हमने जाना कि—
- श्रीपाद श्रीवल्लभ साक्षात दत्तात्रेय के अवतार हैं, जो आज भी भक्तों की पुकार का उत्तर देते हैं।
- पिठापुरम सिद्धभूमि है, जहाँ शिव, शक्ति और विष्णु की ऊर्जा का अद्वितीय संगम होता है।
- श्रीपाद अष्टकम्, श्रीवल्लभ स्तोत्रम् और सिद्धमंगलस्तोत्र जीवन की बाधाओं को दूर कर मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली दिव्य कुंजियाँ हैं।
अब समय है कि आप केवल पढ़कर न रुकें, बल्कि इस दिव्य साधना का अनुभव स्वयं करें। श्रद्धा और विश्वास के साथ किसी एक स्तोत्र का पाठ आज ही प्रारंभ करें। अनुभव करें कि कैसे आपका जीवन आंतरिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और दिव्य कृपा से परिपूर्ण होता है।
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।। श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ।।